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geruee sham

याद है वो गेरूई शाम, जब खेल कर लौटते वक़्त बच्चों का रेला ही कायानात होता था!! याद है वो लंबी रात जब अधसोई रातों मैं माँ का आँचल ही तारीफ की बात होता था!! वो नीली सुबह वो जगमग दोपहर जब जन्नत और कुच्छ नही कक्षा मैं यारों का साथ होता था!! आब-ओ-दाना रोशन करने को बिजली के बल्ब की ज़रूरत ना होती थी तब, औलाद के चश्मों का नूर ही जहाँ का आफताब होता था!! मखमली नरम बिछौने और एयर कंडीशनर की हमें कभी ज़रूरत ना थी,चबूतरे की नीम के नीचे का पलंग ही आरामगाह होता था!! सिनेमा और डिस्को मैं रॅमी इन शामों से तौबा हुआ करती थी, मज़ार की क़व्वाली और माँ की लोरी ही हमारा अल्हान होता था!! पेप्सी,कोला और मिनरल वॉटर के इंतेज़ार में प्यासे कभी ना रहे, आँगन के कुवै का पानी ही आब-ओ-हयात होता था!! ये लंबी गाड़ियों से नापने वाली दूरी तो हमारे बीच कभी ना रही, यारों की संगत कश्ती और ख़्याल बादबान होता था!! साथ की कमी नहीं होती थी पहले हिन्दुस्तान में, जब हर किसी को अपने पड़ोसी का नाम याद होता था!! भिन्न भिन्न भाषा धर्म और प्रांत होकर भी यह देश एक था क्योंकि तब जोड़ने वाला इंटरनेट नहीं एक जज़्बात होता था!! कुच्छ भी कर गुज़रने के इस जज़्बे के पीछे किसी मशीन की ताक़त ना थी, माँ, बाप, भाई, बहेन, साथी या ईश्वर का सिर पर हाथ होता था!! हिन्दुस्तान का वो पुराना मौसम अभी बीता नही बस कुछ धीमा हुआ है,लाएँगे वही समा दोबारा क्योंकि थके की ज़रूरत सहारा नही, साथ होता था!!

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Written by Aaryansh

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