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बचपन

जब हर धूप सुनेहरी थी, जब हर शाम मखमली थी, हर मोड़ जाना पहचाना, घर जाती जब हर गली थी! दोस्ती से दूसरा न रिश्ता जाना था, सच से अलग ना बात मानी थी, जब हर काम एक खेल और हर खेल शैतानी थी! घर पर वक़्त की कमी न थी, बातों से कभी थके ना थे, बाग के सारे आम मीठे थे, क्या हुआ जो पके न थे? माँ की लोरी पूजा और पापा की पर्छाई ही कायनात थी, हर वक़्त खुश थे , क्या बस इतनी सी बात थी? बातें जो कभी ख़त्म न होती थी, आज कहाँ चली गयी हैं? पल भर को जिनसे दूर न होते थे, उनसे मिले मानो सदियाँ हो गयी हैं! आज भी गलियाँ तो वही हैं मगर ये कैसा एहसास है? कभी जो करीब था आज वो घरौंदा कहाँ इतना पास है? धूप धुएँ से भरी न शाम मखमली रही है, इतनी तेज़ी से जाता है जो बचपन क्या ये सही है?

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Written by Aaryansh

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