in

लघु कथा “दीवार”

दीवार

Loading...
जब दीवार का जिक्र होता है तो पता नहीं क्यों मुझे मेरे गाँव की याद आ जाती है. मेरे दादा जी के समय की वो दीवार. जो हमे अनायास ही देखती, हमारी हर हरकतों को ऐसे देखती कि अभी बोल देगी हमारी सारी शरारतें अम्मा को. वो दीवार हम सब भाई बहनों को कभी कभी इतनी बेबस दिखती कि हम उससे अक्सर अपने कपड़ों से साफ़ कर दिया करते थे, पर उसके हालत पर कोई असर नहीं होता था. बरसात में उसके उपर पानी ऐसे जैम जाता मानो जैसे बरसात के बाद गेंहूँ की बालियों पर पानी जमा हो, जैसे पेड़ों की पत्तियों के मुंह पर पानी जमा हो, जैसे किसी गड्ढे में पानी जमा हो. और जब तक कोई उसको न हिलाए वो पानी वहीँ रहता है. वो दीवार भी शायद हमारा ही इंतजार किया करती थी कि हम आयें और उसके उपर पानी की चादर को हाथों से साफ़ करें.  और फिर हम उस दीवार के सिराहने खेलने लगते. फिर एक बार जब हम गर्मियों की छुट्टियों में गाँव आये तो हमे वो ख़ुशी न मिली. अब वो बूढ़ी दीवार अपनी जगह नहीं थी. उसकी जगह एक नयी दीवार ने ली थी. और उस पर अब पानी भी नहीं टिकता था. 
nayadinnayikahani

Report

Loading...

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments

Believe me..!!!

Yellowstone in Summer: Part 2/2