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Antardwand – अंतरद्वन्द

जीवनमृत सा प्रतीतहो रहा
कम पड़ रहें श्वास हैं
करुणासे आखें भरआईं
छूटरहा विश्वास है
इच्छाओँका पतन होरहा
संघर्षलगता व्यर्थ है
ह्रदयको ऐसी मारलगी के
चारोंतरफ अनर्थ है
जिनकेस्वप्नों ने जीवनको
जीनेका इक अर्थदिया
जिनकेना होनें नेइतनी
कविताओंको जन्म दिया
आजउन्हीं को समक्षपाकर
डरडर श्वास येआतें हैं
प्रेमरस तो मिथ्याहो गई
कविताकड़वी गाठें हैं
साहसदुस्साहस के
असमंजसको कैसे पारकरूँ
जिनसेलड़ना है वोअपने हैं

कैसेजीवन का उद्धारकरूँ!!
Note: कभी आप ने अपने आप को ऐसी अवस्था में पाया, जब आप अपने आपसे ऐसी लड़ाई में उलझे हों की कुछ समझ में न आये, आप का अनुभव कैसा था?

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