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ग़ज़ल : समन्दर

सभी को लगे खूब प्यारा समन्दर,

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सुहाना ये नमकीन खारा समन्दर,


नसीबा के चलते गई डूब कश्ती,

मगर दोष पाये बेचारा समन्दर,

 

दिनों रात लहरों से करता लड़ाई,

थका ना रुका ना ही हारा समन्दर,

 

कई राज गहरे छुपाकर रखे है,

नहीं खोलता है पिटारा समन्दर,


सुबह शाम चाहे कड़ी दोपहर हो,

हजारों का इक बस सहारा समन्दर.


 

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Written by Arun Sharma

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ग़ज़ल : जिद में

Guilty