उदयपुर शहर की स्थापना कैसे हुई | How was udaipur city founded

उदयपुर शहर की स्थापना कैसे हुई | How was udaipur city founded

उदयपुर शहर के संस्थापक कोन थे, उदयपुर शहर की स्थापना के पीछे क्या कारण रहा था.

India World History
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How was udaipur city founded

 

उदयपुर शहर की स्थापना कैसे हुई हालांकि उदयपुर की कहानी सिर्फ ईंट-पत्थर और किलों की नहीं है, बल्कि यह मानवता के साहस, साम्राज्य की सीमाओं और एक राजा की दूरदर्शिता की कहानी है। 

 

1559 के आस-पास, महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने चित्तौड़गढ़ पर मोगल आक्रमण के बाद अपनी राजधानी को एक सुरक्षित जगह पर स्थानांतरित करने की जरूरत महसूस की।

 

1567 में बादशाह अकबर की ताकत बढ़ने लगी थी, और बार-बार हो रहे हमलों ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि अब एक ऐसी जगह ढूंढनी होगी जो दुश्मन की पहुंच से दूर हो और जहां जीवन जीने के लिए जरूरी संसाधन भी हों।

 

चित्तौड़गढ़ फोर्ट से निकलते समय महाराणा उदय सिंह के दिल में मातृभूमि के प्रति प्रेम और अपने वफादार लोगों की चिंता दोनों एक साथ धड़क रही थीं। 

 

उनके साथ मुख्य रूप से दर्जीपुत्र अंकित और ज्योतिषी नाइक थे, जिन्होंने सुझाव दिया कि बरसात के मौसम के दौरान पहाड़ियों की हरी-भरी वादियों में नया नगर बसाना सुरक्षित रहेगा।

 

महाराणा की किस्मत उन्हें एक स्थानीय व्यक्ति तुलसीराम के मार्गदर्शन में, राजस्थान के सूखे मरुस्थल से दूर, पानी और हरियाली से भरे एक खूबसूरत स्थान की ओर ले गई। 

 

इस जगह का नाम था – बतौली गाँव के पास की पहाड़ियों में एक प्राकृतिक जलाशय, जिसे बाद में पीचोला झील के नाम से जाना गया।

 

जब महाराणा उदय सिंह द्वितीय और उनके परिवार के लोग इस नए क्षेत्र में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि यह जगह ऊँचे-नीचे पहाड़ों के बीच एक खुला मैदान था। 

 

एक तरफ एक छोटी नदी बह रही थी और दूसरी ओर विशाल पहाड़ थे। सरस्वती मंदिर के पास एक आदिवासी समूह भी था।

 

जो अपनी उगाई हुई सब्जियों और फसलों को बेचने का काम कर रहा था। महाराणा ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। 

 

और उन्हें भरोसा दिलाया कि नए नगर में उनके रीति-रिवाज और जीवन-मूल्य सुरक्षित रहेंगे।

 

उदयपुर शहर की स्थापना कैसे हुई | How was udaipur city founded

 

नगर के निर्माण के लिए शिल्पकारों, वास्तुकारों और खाद्य विशेषज्ञों की एक टीम वहां आई। खेतों के बीच एक प्राकृतिक चट्टान को तोड़कर एक बड़ा जलाशय बनाया गया, जिस पर किले की नींव रखी गई। 

 

इसी जलाशय के चारों ओर उदयपुर का पहला किला और दरबार हॉल (प्रताप दुर्ग) बना।

 

महाराजा उदय सिंह ने राज्य की पहली बैठक इसी जलाशय के किनारे एक सेब के पेड़ के नीचे बुलाई, जहां सिपाही, नागरिक और विद्वान नए नगर के आदर्श, नियम और सुरक्षा व्यवस्था तय करने के लिए इकट्ठा हुए। 

 

इस बैठक में एक वृद्ध कवि ने उदयपुर के भविष्य के सपनों का वर्णन करते हुए कहा:

 

“जब नदी के जल में सूरज अपनी छवि दिखाएगा, तब यह नगर इतिहास के पन्नों पर अपनी सुनहरी पहचान बनाएगा।”

 

नगर की चारों दिशाएं पहाड़ों से सुरक्षित थीं; दक्षिण-पश्चिम में मानिकाचल, उत्तर में गुहला पहाड़ी, पूर्व में रानी कुंड और पश्चिम में तुनकिया घाट। हर घाटी के प्रवेश मार्ग पर चौकियाँ बनाई गईं, 

 

जहां रिकॉर्ड रखा जाता था कि कौन आया और गया, ताकि दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।

 

1613 के आस-पास, उदय सिंह के उत्तराधिकारी महाराणा प्रताप सिंह ने इस नगर को और मजबूत बनाने के लिए महारानी के सुझाव पर कांचौटी तालाब (फतेह सागर) और बाग-बगिचों का निर्माण कराया।

 

उदयपुर की हरियाली और नीली झीलों ने इसे “पूर्व का वेनिस” का खिताब दिलाया। आजआज जब कोई उदयपुर घूमता है, तो उसे उस समय की ठंडी हवा का एहसास होता है।

 

जब यहाँ का माहौल इतिहास से भरा हुआ था। इस इतिहास में संघर्ष भी हैं, लेकिन सबसे बड़ी जीत मानवता की संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सीख है।

 

जिसे महाराणा उदय सिंह ने समझा और अमल किया। इसी सीख ने उदयपुर को सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि जीवन, कला, संस्कृति और मानवीय रिश्तों का अनूठा संगम बना दिया।

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