नवरात्रि विशेष लेख | माँ दुर्गा की विजय, धर्म की जिम्मेदारी और आज के समाज का आईना
लेखिका: ईशिका तनेजा
नवरात्रि आते ही माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा फिर जीवंत हो उठती है। मंदिरों में जयकारे गूँजते हैं, घरों में पूजा होती है और हम पूरे विश्वास से कहते हैं—अंत में जीत धर्म की ही होती है।
लेकिन कभी रुककर सोचिए। जिस महिषासुर के अंत का उत्सव हम हर साल मनाते हैं, उस कथा का संदेश आज हमारी दुनिया में कितना दिखाई देता है?
आज भी ईमानदार व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ताकतवर लोग कमजोरों को दबाते हैं। गलत काम करने वाले कई बार सम्मान पाते हैं, जबकि सच बोलने वाले को उसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
अगर माँ दुर्गा ने अधर्म पर विजय प्राप्त की थी, तो फिर अधर्म बार-बार सिर क्यों उठाता है?
इस सवाल का उत्तर केवल पौराणिक कथा में नहीं, बल्कि उस जीवन में भी छिपा है जिसे हम हर दिन जीते हैं।
महिषासुर केवल एक कथा का पात्र नहीं, एक चेतावनी भी है
सनातन परंपरा में महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसका अहंकार और अत्याचार बढ़ता गया। जब देवता उसका सामना नहीं कर सके, तब उनकी दिव्य शक्तियों के एकत्र होने से माँ दुर्गा प्रकट हुईं और उन्होंने महिषासुर का वध किया।
यह कथा केवल एक युद्ध में हुई विजय का वर्णन नहीं करती। यह याद दिलाती है कि शक्ति जब अहंकार और अत्याचार का साधन बन जाती है, तब उसका विरोध आवश्यक हो जाता है।
आज के जीवन में बुराई हमेशा किसी राक्षस के रूप में सामने नहीं आती। कई बार वह हमारे अपने बहानों में छिपी होती है—“सब ऐसा ही करते हैं”, “मुझे इससे क्या लेना-देना?” या “अपने फायदे के लिए इतना तो चलता है।”
जब कोई अपने पद का इस्तेमाल दूसरों को दबाने के लिए करता है, जब हम फायदे के लिए बेईमानी को सही ठहराते हैं, या जब अन्याय देखकर भी चुप रहते हैं, तब सवाल केवल दूसरे व्यक्ति के चरित्र का नहीं रह जाता। सवाल यह भी होता है कि हम किस तरह के समाज को बढ़ावा दे रहे हैं।
हर गलती अधर्म नहीं होती। लेकिन जब स्वार्थ बार-बार विवेक पर भारी पड़ने लगे, तो समस्या केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती।
धर्म की रक्षा एक बार नहीं, हर पीढ़ी को करनी पड़ती है
एक पीढ़ी न्याय के लिए संघर्ष करती है, लेकिन अगली पीढ़ी को उस न्याय को बनाए रखना पड़ता है। कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन समाज को भी यह तय करना पड़ता है कि वह भ्रष्टाचार को सामान्य मानकर स्वीकार करेगा या उसका विरोध करेगा।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण धर्म के पतन और अधर्म की वृद्धि के समय धर्म की पुनर्स्थापना की बात कहते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।
यह श्लोक धर्म की पुनर्स्थापना के महत्व को सामने रखता है। आस्था हमें केवल चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं सिखाती; वह अपने कर्तव्य को पहचानने और सही के पक्ष में खड़े होने का साहस भी दे सकती है।
हम हर अन्याय को रोक नहीं सकते, लेकिन अपने स्वार्थ के लिए अन्याय का हिस्सा बनने से तो बच सकते हैं।
माँ दुर्गा की शक्ति का अर्थ अपने जीवन में समझिए
नवरात्रि केवल माँ दुर्गा की शक्ति के सामने शीश झुकाने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी शक्ति और उसके इस्तेमाल पर विचार करने का भी समय है।
क्या हम अपने अधिकार का उपयोग दूसरों की मदद के लिए करते हैं या उन्हें दबाने के लिए? क्या किसी के साथ अन्याय होने पर आवाज उठाते हैं? क्या हम अपनी गलती स्वीकार कर पाते हैं, या अहंकार के कारण उसे सही साबित करने में लगे रहते हैं?
साहस का अर्थ हमेशा लड़ना नहीं होता। कभी सच बोलना साहस है, कभी गलत काम में साथ देने से इनकार करना, कभी अन्याय सह रहे व्यक्ति का साथ देना और कभी अपनी गलती मान लेना।
माँ दुर्गा की आराधना का संदेश तभी हमारे जीवन में उतरता है, जब हमारी अपनी शक्ति किसी के शोषण का कारण न बने।
विजय का उत्सव मनाइए, लेकिन उसके संदेश को मत भूलिए
अगर अधर्म बार-बार लौटता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म की विजय व्यर्थ है। इसका अर्थ है कि अच्छाई को बनाए रखने के लिए हर पीढ़ी को अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
हर समाज तय करता है कि वह किस अन्याय को स्वीकार करेगा। हर व्यक्ति तय करता है कि वह सच का साथ देगा या अपनी सुविधा का।
माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय हमें याद दिलाती है कि अत्याचार के सामने झुकना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। लेकिन उस विजय का संदेश तभी सार्थक होगा, जब हम अपने जीवन में भी न्याय, साहस और जिम्मेदारी को स्थान देंगे।
इस नवरात्रि, माँ दुर्गा के सामने प्रार्थना करते समय एक सवाल स्वयं से भी पूछिए—
जिस अधर्म के अंत की प्रार्थना हम करते हैं, कहीं उसे बढ़ावा देने में हमारी चुप्पी, हमारा स्वार्थ या हमारा अहंकार तो शामिल नहीं?
क्योंकि धर्म की विजय का उत्सव मनाना एक बात है, और अपने कर्मों से धर्म के पक्ष में खड़ा होना दूसरी।
— ईशिका तनेजा
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