Why Does Hair Fall Increase During the Monsoon According to Ayurveda

Why Does Hair Fall Increase During the Monsoon According to Ayurveda

बरसात का मौसम तपती गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ एक ऐसी समस्या भी लेकर आता है जिसका सामना बहुत से लोग करते हैं। और यह समस्या है बालों का सामान्य से अधिक झड़ना। अधिकांश लोग इसका कारण केवल नमी, प्रदूषण या अनुपयुक्त केश-उत्पादों को मानते हैं, जबकि आयुर्वेद इसे कहीं अधिक गहराई से समझाता है। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु केवल मौसम का परिवर्तन नहीं है। यह उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर संक्रमण का समय है, जब प्रकृति में होने वाले परिवर्तन शरीर की आंतरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करने लगते हैं। इ

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बरसात का मौसम तपती गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ एक ऐसी समस्या भी लेकर आता है जिसका सामना बहुत से लोग करते हैं। और यह समस्या है बालों का सामान्य से अधिक झड़ना। अधिकांश लोग इसका कारण केवल नमी, प्रदूषण या अनुपयुक्त केश-उत्पादों को मानते हैं, जबकि आयुर्वेद इसे कहीं अधिक गहराई से समझाता है।

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु केवल मौसम का परिवर्तन नहीं है। यह उत्तरायण से दक्षिणायन की ओर संक्रमण का समय है, जब प्रकृति में होने वाले परिवर्तन शरीर की आंतरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करने लगते हैं। इस ऋतु में पाचन, धातुओं का पोषण और शरीर का संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिसका प्रभाव बालों के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है।

आयुर्वेद बालों के झड़ने को केवल सिर की समस्या नहीं मानता, बल्कि इसे शरीर के भीतर होने वाले परिवर्तनों का संकेत मानता है। इसीलिए आयुर्वेदिक चिकित्सा में बदलते मौसम में बालों की देखभाल और संतुलित पोषण के लिए वर्षा ऋतुचर्या का पालन एवं आयुर्वेदिक तेल, जैसे की नीलीभृंग्यादी केर तेल, से नियमित मालिश को विशेष महत्व दिया गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि वर्षा ऋतु में बाल अधिक क्यों झड़ते हैं और इस स्थिति में आयुर्वेद क्या सलाह देता है।

वर्षा ऋतु में शरीर में क्या परिवर्तन होते हैं?

वर्षा ऋतु में बालों का झड़ना किसी एक कारण से नहीं होता। वातावरण में बढ़ी हुई नमी, अत्यधिक पसीना, तापमान में बदलाव और मौसम की आर्द्रता मिलकर शरीर तथा सिर की त्वचा दोनों को प्रभावित करते हैं।

आयुर्वेद बताता है कि वर्षा ऋतु में अग्नि (पाचन शक्ति) स्वाभाविक रूप से मंद हो जाती है। जब अग्नि कमजोर होती है, तब भोजन का समुचित पाचन नहीं हो पाता और शरीर की धातुओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता।

इसी समय ग्रीष्म ऋतु में संचित पित्त वर्षा ऋतु में प्रकोपित होने लगता है, जबकि वात भी असंतुलित होने लगता है। पित्त और वात का यह संयुक्त प्रभाव सिर की त्वचा तथा बालों की जड़ों को अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील बना देता है।

इस तथ्य का उल्लेख चरक संहिता में भी मिलता है -

आदानग्लानवपुषां अग्निः क्षीणो भवति चेह सः ।
वर्षासु भूर्बाष्पघनात् मेघेभ्यः क्लेदनात तथा ॥

Source: चरक संहिता (सूत्रस्थान ६/२२)

अर्थात् ग्रीष्म ऋतु की उष्णता से शरीर पहले ही कुछ दुर्बल हो चुका होता है। ऐसे में वर्षा ऋतु की नमी और वातावरण में बढ़े हुए क्लेद के कारण अग्नि और भी मंद हो जाती है, जिससे शरीर की पोषण क्षमता प्रभावित होती है।

जब शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो इसका प्रभाव सबसे पहले बालों और त्वचा जैसी संरचनाओं पर दिखाई देने लगता है।

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ बालों का आधार क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ बाल केवल बाहरी देखभाल से नहीं, बल्कि शरीर के भीतर होने वाले उचित पोषण से प्राप्त होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि अस्थ्नां तु उपधातुः केशाः, अर्थात् केश (बाल), अस्थि धातु के उपधातु माने गए हैं। इसका अर्थ यह है कि बालों का स्वास्थ्य शरीर की सम्पूर्ण धातु-पोषण प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यह प्रक्रिया रस धातु से प्रारम्भ होकर क्रमशः अन्य धातुओं तक पहुँचती है।

 

जब वर्षा ऋतु में मंदाग्नि के कारण रस धातु का निर्माण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता, तब आगे बनने वाली धातुओं का पोषण भी प्रभावित होता है। परिणामस्वरूप बालों की जड़ें कमजोर पड़ सकती हैं, बालों की चमक कम हो सकती है और उनका झड़ना बढ़ सकता है। इसीलिए आयुर्वेद बालों के झड़ने को केवल सिर की समस्या नहीं मानता, बल्कि इसे शरीर की आंतरिक स्थिति, पाचन शक्ति और धातु-पोषण का दर्पण मानता है।

क्या आप भी मानसून में ये सामान्य गलतियाँ कर रहे हैं?

वर्षा ऋतु में कुछ मात्रा में बाल झड़ना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन हमारी कुछ दैनिक आदतें इस समस्या को और बढ़ा सकती हैं।

1. सिर की त्वचा को लंबे समय तक गीला रखना

बाल धोने के बाद उन्हें देर तक गीला रखना या बार-बार नमी में रहना सिर की त्वचा में क्लेद (अत्यधिक नमी) बढ़ा सकता है। इससे सिर की स्वच्छता और संतुलन प्रभावित हो सकते हैं।

2. केवल बालों की देखभाल करना, सिर की त्वचा की नहीं

स्वस्थ बालों की शुरुआत स्वस्थ सिर की त्वचा से होती है। यदि केवल बालों पर ध्यान दिया जाए और जड़ों तथा सिर की त्वचा के पोषण की उपेक्षा की जाए, तो अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।

3. पूरे वर्ष एक जैसी केश-देखभाल अपनाना

आयुर्वेद ऋतुचर्या का पालन करने पर बल देता है। जिस प्रकार प्रत्येक ऋतु में आहार और दिनचर्या बदलती है, उसी प्रकार बालों की देखभाल भी मौसम के अनुसार बदलनी चाहिए। यही कारण है कि आयुर्वेद प्रत्येक ऋतु के अनुसार केश-देखभाल की अलग सलाह देता है। जैसे वर्षा ऋतु में नमी और मंदाग्नि को ध्यान में रखते हुए देखभाल की आवश्यकता होती है, वैसे ही शीत ऋतु में रूखापन और वात की वृद्धि के अनुसार अलग उपाय अपनाए जाते हैं। इसीलिए सर्दियों में बालों की देखभाल के लिए भी आयुर्वेदिक तेल, जैसे कि, नीलीभृंग्यादी केर तेल के पारंपरिक उपयोग का विशेष महत्व बताया गया है।

4. अधिक भारी, खट्टे और नमकीन भोजन का सेवन

वर्षा ऋतु में अत्यधिक गुरु (भारी), अम्ल (खट्टे) तथा लवण (नमकीन) पदार्थों का अधिक सेवन अग्नि को और मंद कर सकता है। इससे आम बनने की संभावना बढ़ती है, जो शरीर में पोषण के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।

5. अनियमित दिनचर्या अपनाना

पर्याप्त नींद न लेना, तनाव, कम जल सेवन तथा अनियमित जीवनशैली भी बालों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। आयुर्वेद संतुलित दिनचर्या अपनाने की सलाह देता है ताकि शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहें।

 

वर्षा ऋतु में आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ क्यों हैं विशेष?

आयुर्वेद किसी एक औषधि पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अनेक गुणों वाली वनौषधियों को उचित अनुपात में मिलाकर ऐसे योग तैयार करता है जो शरीर को समग्र रूप से संतुलित करने में सहायक होते हैं।

भृंगराज — केशराज

आयुर्वेद में भृंगराज को “केशराज”, अर्थात् केशों का राजा कहा गया है। इसे श्रेष्ठ केश्य द्रव्यों में स्थान प्राप्त है। यह बालों की जड़ों तथा सिर की त्वचा के पोषण के लिए पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है।

नीली — व्यञ्जनकेशी

नीली को शास्त्रों में “व्यञ्जनकेशी” कहा गया है, अर्थात् वह जो बालों की प्राकृतिक शोभा और कांति को बनाए रखने में सहायक हो। वर्षा ऋतु में यह सिर की त्वचा को संतुलित रखने तथा बालों की प्राकृतिक सुंदरता बनाए रखने के लिए उपयोगी मानी जाती है।

आमलकी — धात्री

आयुर्वेद में आमलकी को “धात्री” कहा गया है, जिसका अर्थ है माता के समान पोषण देने वाली। यह त्रिदोष को संतुलित रखने वाली प्रमुख रसायन द्रव्य मानी जाती है और बालों तथा सिर की त्वचा के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यष्टिमधु — एक श्रेष्ठ केश्य द्रव्य

यष्टिमधु को आयुर्वेद में प्रमुख केश्य द्रव्यों में स्थान दिया गया है। यह वात और पित्त को संतुलित रखने तथा सिर की त्वचा के स्वास्थ्य को बनाए रखने में पारंपरिक रूप से उपयोगी मानी जाती है।

केर तैल — शीत वीर्य युक्त आधार

इन सभी औषधियों को केर तैल (नारियल तेल) में सिद्ध किया जाता है। आयुर्वेद में नारियल तेल को शीत वीर्य वाला माना गया है। यह वनौषधियों के गुणों को गहराई तक पहुँचाने के साथ-साथ सिर की त्वचा को पोषण और शीतलता प्रदान करता है।

इन्हीं श्रेष्ठ वनौषधियों के संतुलित संयोजन से तैयार पुनर्वसु नीलीभृंग्यादी केर तैल वर्षा ऋतु में सिर की त्वचा का पोषण करने तथा बालों को स्वस्थ, मजबूत और स्वाभाविक रूप से सुंदर बनाए रखने के लिए पारंपरिक आयुर्वेदिक देखभाल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। इन्हीं गुणों के कारण आयुर्वेद में नीलीभृंग्यादी केर तैल को केवल मौसमी केश-देखभाल तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि बालों की अनेक सामान्य समस्याओं में भी पारंपरिक रूप से उपयोगी बताया गया है।

स्वस्थ बालों की शुरुआत ऋतु के अनुरूप जीवनशैली से होती है

वर्षा ऋतु में बालों का झड़ना केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं है। आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर की पाचन शक्ति, धातुओं के पोषण और ऋतु के प्रभाव से जुड़ा हुआ विषय है।

यदि हम वर्षा ऋतुचर्या और संतुलित दिनचर्या का पालन करें, उचित आहार लें और समय-समय पर पारंपरिक आयुर्वेदिक वनौषधियों का सहारा लें, तो बालों के स्वास्थ्य को भीतर से बेहतर बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

यदि आप भी वर्षा ऋतु में अपने केशों और सिर की त्वचा की समग्र आयुर्वेदिक देखभाल करना चाहते हैं, तो पुनर्वसु नीलीभृंग्यादी केर तैल जैसे शास्त्रीय आयुर्वेदिक योग, जिनमें भृंगराज, नीली, आमलकी, यष्टिमधु और केर तैल जैसे पारंपरिक द्रव्य सम्मिलित हैं, आपके मौसमी केश-देखभाल क्रम का एक उपयोगी हिस्सा बन सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न १. क्या मानसून में बाल झड़ना सामान्य है?

उत्तर: हाँ, वर्षा ऋतु में कुछ लोगों में सामान्य से अधिक बाल झड़ना देखा जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार इस मौसम में अग्नि (पाचन शक्ति) मंद हो जाती है और वात-पित्त के असंतुलन के कारण बालों की जड़ों का पोषण प्रभावित हो सकता है। यदि समय रहते उचित आहार, ऋतुचर्या और केश-देखभाल अपनाई जाए, तो इस मौसमी परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।

प्रश्न २. आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में बालों की देखभाल कैसे करनी चाहिए?

उत्तर: आयुर्वेद वर्षा ऋतु में ऋतुचर्या का पालन करने की सलाह देता है। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित दिनचर्या, सिर की स्वच्छता बनाए रखना, बालों को लंबे समय तक गीला न रखना तथा नीलीभृंग्यादी केर तैल जैसे पारंपरिक आयुर्वेदिक तैल से सिर की त्वचा का पोषण करना इस मौसम में लाभकारी माना जाता है।

प्रश्न ३. क्या केवल बाहरी देखभाल से बाल झड़ना कम किया जा सकता है?

उत्तर: आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ बाल केवल बाहरी देखभाल पर निर्भर नहीं करते। बालों का स्वास्थ्य अग्नि, धातुओं के पोषण और शरीर के आंतरिक संतुलन से भी जुड़ा होता है। इसलिए उचित आहार, संतुलित जीवनशैली और बाहरी केश-देखभाल, तीनों का साथ होना आवश्यक माना गया है।

प्रश्न ४. नीलीभृंग्यादी केर तैल में कौन-सी प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ होती हैं?

उत्तर: पारंपरिक नीलीभृंग्यादी केर तैल में सामान्यतः भृंगराज, नीली, आमलकी, यष्टिमधु तथा केर तैल (नारियल तेल) जैसे द्रव्य सम्मिलित होते हैं। आयुर्वेद में इन वनौषधियों को केशों और सिर की त्वचा के पोषण, संतुलन और स्वस्थ केश-देखभाल के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

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