Ghazal

Kokila
Kokila
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चाँद जा डूबा, भरी धरती ने आह,
देखो फिर से बारिशें होने लगी।

 रंग नाज़ुक उड़ गए, खुशबू फना
लफ़्ज़ों में झूठी खनक होने लगी।

कह दिया, 'तुम हो' यही काफी मुझे
जाने क्यों तुमको ख़लिश होने लगी?

जो चले जाते हैं फिर आते नहीं
मेरे दर की हर कड़ी रोने लगी।

रोकने से कौन रुकता है यहाँ?
रात फिर भी रोज़ तकिया भिगोने लगी।

आज फिर धक्का दिया दिन को जरा
तारीख़ें जैसे ज़हर होने लगीं।

कूकती थीं कोयलें जो बाग में
सय्याद को ख़ुद से नज़र होने लगीं।Original link

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