Devshayani Ekadashi 2021: देवशयनी एकादशी पर जानिए पूर्ण परमात्मा की सही पूज

Devshayani Ekadashi 2021: देवशयनी एकादशी पर जानिए पूर्ण परमात्मा की सही पूजा विधि

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आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी यानी देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi 2021) 20 जुलाई को है। मान्यता है इस दिन से 4 महीने तक भगवान विष्णु आराम करते हैं। जानिए देवशयनी एकादशी से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य, भगवान विष्णु की सही पूजा एवं सुख प्राप्ति विधि। जानिए क्या है गीता में जागरण को लेकर सन्देश, तत्वदर्शी सन्त मोक्षदाता, सुखदाता हैं एवं भाग्य में न लिखा हो तो भी साधक को सभी सुख, आयु एवं समृद्धि उपलब्धि प्रदान कराते हैं।

Devshayani Ekadashi 2021: मुख्य बिंदु

देवशयनी एकादशी 20 जुलाई को है।मान्यता है देवशयनी एकादशी से अगले 4 महीने तक भगवान विष्णु करते हैं विश्रामजानें भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का उपायश्रीमद्भगवद्गीता में जानें व्रत के विषय में अति महत्वपूर्ण सन्देशभाग्य में न लिखा हो तो भी तत्वदर्शी सन्त सभी सुख, आयु एवं समृद्धि उपलब्ध कराते हैं

देवशयनी एकादशी की लोकवेदानुसार कथा

वैसे तो वर्ष में कुल चौबीस एकादशियाँ होती हैं किंतु हिन्दू धर्म में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से आगे के चार महीनों तक भगवान विष्णु विश्राम करने चले जाते हैं। इसके पश्चात भगवान विष्णु को उठाया जाता है जिसे देवउठानी एकादशी कहते हैं। आज के दिन व्रतादि कर्मकांड एवं पूजन लोकवेदानुसार किया जाता है।

https://youtu.be/9FBArONjk14

https://youtu.be/9FBArONjk14

https://youtu.be/9FBArONjk14इसके पीछे कथा यह बताई जा रही है कि भगवान विष्णु इस तिथि से चार महीने तक पाताल के राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं एवं कार्तिक शुक्ल एकादशी को वापस लौटते हैं। इस दौरान लोग शुभ कार्य प्रारम्भ करना वर्जित समझते हैं किंतु वास्तविक कथा कुछ और ही है जो आगे वर्णित है।

Devshayani Ekadashi 2021: राजा बली और बामन अवतार की कथा

भक्त प्रह्लाद का पुत्र बैलोचन हुआ और बैलोचन का पुत्र राजा बली हुआ। जानकारी के लिए बताएं कि एक इंद्र का शासनकाल 1008 चतुर्युग का होता है। इसके पश्चात इंद्र की मृत्यु हो जाती है। किन्तु इसी बीच यदि पृथ्वी पर किसी ने भी 100 अश्वमेघ यज्ञ निर्बाध पूरी कर लिए तो उसे इंद्र का शासन मिल जाता है। राजा बली ने 99 यज्ञ निर्बाध पूरे कर लिए थे। राजा इंद्र कुछ नहीं कर सके। 100वीं यज्ञ के समय राजा इंद्र का शासन डोल गया और वह चिंतित होकर भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु जी ने इंद्र को निर्भय होकर राज्य करने का वचन दिया किन्तु उपाय सोचने लगे एवं पूर्ण परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे। इतने में सर्व सृष्टिकर्ता एवं पालनकर्ता पूर्णब्रह्म कबीर साहेब बामन रूप में राजा बली के सामने आए। राजा बली ने सम्मानपूर्वक उन्हे बिठाया और तब बामन रूप में परमात्मा ने राजा से दक्षिणा का वचन लिया कि वे जो मांगेंगे उन्हें मिलेगा।

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राजा बली के गुरु शुक्राचार्य ने राजा से प्रतिज्ञा भंग करने के लिए कहा।  लेकिन राजा ने कहा जब स्वयं परमात्मा दान लेने द्वार पर आया हो तो मना नहीं करना चाहिए। बामन अवतार में परमात्मा ने राजा से दान में तीन डग (तीन कदम) जमीन के मांगे। जब राजा बली ने हामी भरी तब परमात्मा अपने विशाल रूप में आये तथा एक डग में पूरी धरती, दूसरे डग में सारा आकाश नाप लिया तीसरे डग के लिए स्थान मांगा। तब राजा बली ने कहा भगवन सन्तों ने शरीर को पिंड एवं ब्रह्मण्ड की संज्ञा दी है आप अपना तीसरा कदम मेरे ऊपर रख लें। इतना कहकर राजा बली लेट गए और परमात्मा ने उनके शरीर पर तीसरा पैर रखकर दान लिया। 

राजा बली द्वारा दिए दान से प्रसन्न होकर परमात्मा ने उसे सत्संग में तत्वज्ञान सुनाया और बताया कि 1008 चतुर्युग की आयु के बाद राजा इंद्र गधे की योनि प्राप्त करते हैं।  परमात्मा ने राजा बलि को पाताल लोक का राज्य दिया एवं इंद्र के शासन पूरे होने के बाद उसे इंद्र का राज्य देने का भी वचन दिया। इधर तत्कालीन इंद्र पद पर विराजमान राजा की प्रसन्नता की कोई सीमा नही रही और वे भगवान विष्णु को धन्यवाद करने चल पड़े। भगवान विष्णु तब भी सोच विचार ही कर रहे थे कि क्या किया जाए इतने में इंद्र ने आकर उनकी जयजयकार की एवं धन्यवाद किया जिसे भगवान विष्णु ने परमात्मा की महिमा समझी। आजतक हम बामन रूप का श्रेय भगवान श्री विष्णु को देते आये हैं जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। अब आप स्वयं सोचिए जब भगवान विष्णु गए ही नहीं बामन अवतार में तो देवशयनी एकादशी किस बात की? और भगवान विष्णु जब 4 माह विश्राम करेंगे तो सृष्टि कौन चलाएगा?

Devshayani Ekadashi 2021: श्रीमद्भगवतगीता में व्रत के विषय में महत्वपूर्ण सन्देश

वेदों का सार कही जाने वाली गीता में व्रत के विषय में महत्वपूर्ण सन्देश अध्याय 6 के श्लोक 16 में दिया है। इस श्लोक के अनुसार भक्ति न तो अत्यधिक खाने वाले की सफल होगी और न ही व्रत रखने वालों की, न अधिक सोने वालों की सफल होगी न ही बिल्कुल न सोने वालों की सफल होगी। अतएव याद रहे कि अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार हमें शास्त्रानुसार कर्म ही करने चाहिए अन्यथा न सुख की प्राप्ति होगी न सिद्धि की और न ही परमगति की। व्रत करें या नहीं इस दुविधा का समाधान गीता अध्याय 16 का श्लोक 24 करता है जिसमें कहा गया है कि कर्तव्य एवं अकर्तव्य की अवस्था में शास्त्र ही प्रमाण हैं। अब यह हमारे समक्ष स्पष्ट है कि हठयोग, व्रत, जागरण गीता के ज्ञान के विरुद्ध है। व्रत शास्त्र विरुद्ध ही है तथा याद रखें कि सृष्टि का धारण पोषण करने वाला कोई और ही है जिसकी शरण में गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में जाने के लिए कहा है। अतः कोई शयन करे या गहन निद्रा, सृष्टि का पोषण तो कबीर परमात्मा के हाथों में है।

Devshayani Ekadashi 2021: कैसे करें भगवान विष्णु को प्रसन्न

भगवान विष्णु त्रिगुणमयी शक्ति में से एक हैं। भगवत गीता में केवल त्रिगुण उपासना करने वाले मनुष्यों में नीच, मूढ़ और दूषित कर्म करने वाले कहे गए हैं (अध्याय 7 श्लोक 14-15)। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान विष्णु की उपासना ही नहीं करनी है। वे आदरणीय हैं एवं तीन लोकों के स्वामी हैं। इनकी उपासना की क्या विधि है यह तत्वज्ञान जानने से पता होगा और तत्वज्ञान तत्वदर्शी सन्त बताएँगे। इसलिए ही गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में तत्वदर्शी सन्तों की शरण में जाने के लिए कहा है। पूरे विश्व में एकमात्र तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज हैं जो गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में वर्णित ओम् तत् सत् सांकेतिक अक्षरों के वास्तविक मन्त्र को बताते हैं। 

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अति महत्वपूर्ण- सन्तों ने शरीर को पिंड की संज्ञा दी है। इसी पिंड में सभी देवता विभिन्न कमलों में निवास करते हैं। इन देवताओं के मनमाने मन्त्र (भगवते वासुदेवाय नमः, राधे राधे, राम राम, सीताराम) वेदों और गीता में वर्णित नही होंने के कारण शास्त्रविरुद्ध हैं और लाभ नहीं दे सकते। तत्वदर्शी सन्त सही मन्त्र विधि बताते हैं जिससे ये न केवल सभी देवताओं के स्तरों का लाभ साधक को देते हैं बल्कि साधक के लिए मोक्ष का मार्ग भी सुगम कर देते हैं।

News Source: SA News Channel

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